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| साकेत के नवम् सर्ग के आधार पर उर्मिला की विरह वेदना का सोदाहरण वर्णन कीजिए। |
उर्मिला का विरह वर्णन
साकेत मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित रामकथा पर आधारित महाकाव्य है जिसमें कवि ने रामकथा की उपेक्षित पात्र उर्मिला को केन्द्र में रखकर कथावस्तु का निर्माण किया है। साकेत के नवम् सर्ग में उर्मिला का विरह-वर्णन कवि ने बड़े मनोयोग से किया है। उसके विरह वर्णन में मार्मिकता, सजीवता एवं विरह-व्यथित हृदय की टीस व्याप्त है।विरह वेदना के कारण नायिका की अनेक प्रकार की दशाएँ होती है। उर्मिला का विरह वर्णन निम्न शीर्षकों में प्रस्तुत किया जा सकता है।
(1) विरह में प्रकृति निरूपण:
शरद ऋतु का आगमन होने पर खंजन पक्षी दिखाई देने लगते हैं, धूप खिल गई है, सरोवर जल से भरे दिखाई दे रहे हैं और हंस उनमें क्रीड़ा कर रहे हैं। विरहिणी उर्मिला को शरद के रूप में अपने प्रिय लक्ष्मण के विभिन्न अंगों के दर्शन हो रहे हैं। वह अपनी सखी से कहती है :
निरख सखी ये खंजन आए ।
फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मनभाए ।।
इसी प्रकार शिशिर ऋतु के सारे उपादान विरहिणी उर्मिला को अपने तन में ही दिखाई पड़ रहे हैं। जिस प्रकार वन - उपवन पतझड़ के कारण शुष्क हो गए हैं उसी प्रकार उर्मिला का शरीर विरह में सूख गया है। मुख एवं शरीर कुम्हला गया है। आंखें मोती रूपी आंसू बरसाती रहती हैं। वह कहती है :
शिशिर न फिर गिरि-वन में ।
जितना मांगे पतझड़ दूंगी मैं इस निज नन्दन में ।।
(2) विरहिणी उर्मिला का दर्प -
विरहिणी उर्मिला को काम भावना भी सता रही है। वह कामदेव से कहती है कि मैं तो अबला हूं और फिर वियोग व्यथा से पीड़ित हूं। तुम्हें यह शोभा नहीं देता कि तुम मेरे ऊपर प्रहार करो। यदि तुम्हें अपने रूप का गर्व है तो उसे मेरे पति पर न्योछावर किया जा सकता हैं। और यदि तुम्हें अपनी पत्नी रति के रूप का घमण्ड हो, तो लो मेरी चरण धूलि ले जाओ और उस पर न्योछावर कर दो। इस प्रसंग को निम्न पंक्तियों में देखा जा सकता है :
मुझे फूल मत मारो।
मैं अबला बाला वियोगिनी कुछ तो दया विचारो॥
होकर मधु के मीत मदन पटु तुम कटु गरल न गारो ।
मुझे विकलता तुम्हें विफलता ठहरो श्रम परिहारो ॥
(3) प्राचीनता एवं नवीनता का समावेश-
उर्मिला के विरह वर्णन में एक ओर तो प्राचीन परिपाटी का निर्वाह करते हुए विरह ताप, विरहजन्य कृशता तथा अश्रु प्रवाह का समावेश है। तो दूसरी ओर उसमें कहीं भी अस्वाभाविकता न होकर सर्वत्र मनोवैज्ञानिकता अपनाई गई है। ऋतु वर्णन में नायिका की परिवर्तित दिनचर्या का उल्लेख है। विरहजन्य अवस्था का उल्लेख निम्न पंक्तियों में कवि ने किया है :
मानस मन्दिर में सती प्रिय की प्रतिमा थाप ।जलती सी उस विरह में बनी आरती आप ।।
(4) चित्रकूट में क्षणिक मिलन —
चित्रकूट में अयोध्या निवासियों के साथ उर्मिला भी आई है। सीताजी ने उर्मिला और लक्ष्मण का मिलन एक कुटिया में कराया। उर्मिला अत्यन्त क्षीण काय हो गई है। लक्ष्मण क्षण भर तो उसे पहचान भी न पाए :
जाकर परन्तु जो वहां उन्होंने देखा,
तो दीख पड़ी कोणस्थ उर्मिला रेखा ।
यह काया है या शेष उसी की छाया,
क्षण भर उनको कुछ नहीं समझ में आया।
लक्ष्मण की उस मनोदशा को देखकर उर्मिला ने जो कुछ कहा, वह उसकी मानसिक स्थिति एवं पति के प्रति कर्तव्य भावना को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त है :
मेरे उपवन के हरिण आज वनचारी ।
मैं बांध न लूंगी तुम्हें तजो भय भारी । ।
गिर पड़े दौड़ सौमित्र प्रिया पद तल में,
वह भीग उठी प्रिय चरण धरे दृग जल में ।।
यह क्षणिक मिलन पुनः वियोग में परिवर्तित हो गया। साकेत के नवम् सर्ग में उर्मिला की वेदना अपने चरम शिखर पर है। यहीं पर कवि ने निम्न गीत को समायोजित किया है जिसमें अभाव को वेदना का पिता और अदृष्टि को उसकी माता बताया है :
वेदने तू भी भली बनी।
आ अभाव की एक आत्मजे और अदृष्टि जनी ।।
(5) उर्मिला की वेदना का चित्रण -
उर्मिला को विरह में एक आशा थी, क्योंकि उसे पता था कि मेरे प्रिय चौदह वर्ष की अवधि बीतने के बाद अवश्य वापस आएंगे। भावोत्तेजना के क्षणों में भी उसने राजमहल की मर्यादा का सदैव ध्यान रखा । उसका विरह वर्णन अत्यन्त मार्मिक एवं संवेदनशील है:
भूल अवधि सुधि प्रिय से कहती जगती हुई कभी आओ।
किन्तु कभी सोती तो उठती वह चौंक बोलकर जाओ।।
निष्कर्ष :-
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है। कि गुप्तजी ने साकेत में उर्मिला का विरह-वर्णन बड़े मनोयोग से किया है। रामकथा प्रसंग में यह एक मधुर प्रसंग है और गुप्तजी की मौलिक उद्भावना है।
इनके अतिरिक्त, इस सर्ग का अन्त भी, जब उर्मिला लक्ष्मण की भर्त्सना करती है, विरह की स्वाभाविकता एवं मार्मिकता में बांधक है। इन बाधकतत्वों के होते हुए भी, अपने समग्र रूप में, उर्मिला का विरह हिंदी साहित्य की अमर विभूति हैं।
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