प्रयोगवाद को उदाहरण सहित समझाइये| प्रयोगवाद और उसकी प्रवृतियाँ अथवा विशेषताएँ

Sarvesh Sudhakar
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प्रयोगवाद को उदाहरण सहित समझाइये| प्रयोगवाद और उसकी प्रवृतियाँ अथवा विशेषताएँ
प्रयोगवाद को उदाहरण सहित समझाइये। प्रयोगवाद और उसकी प्रवृतियाँ अथवा विशेषताएँ



        प्रयोगवाद - नयी कविता  


प्रगतिवाद कवियों का मार्क्सवाद के प्रति इतना आग्रह था कि वे यथार्थवाद के नाम पर काव्य को नीरस बना रहे थे। धीरे-धीरे यह भी आभास होने लगा कि यह कोई साहित्यिक विचारधारा नहीं है अपितु मार्क्स की राजनीतिक विचारधारा का प्रचार-प्रसार है इससे साहित्य का उद्धार होने वाला नहीं है। प्रगतिवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप हिन्दी साहित्य में प्रयोगवाद आया। प्रयोगवाद को प्रतीकवाद, प्रपद्यवाद, रूपवाद, नयी कविता आदि नाम भी दिये गये। प्रयोगवाद का विकसित रूप नयी कविता है। डॉ. गणपति चन्द्रगुप्त ने ‘प्रयोगवाद, प्रपद्यवाद तथा नयी कविता इन तीनों नामों को उक्त काव्य धारा के विकास की तीन अवस्थायें स्वीकार किया है।' ‘प्रयोगवाद' की शुरुआत सन् 1943 में अज्ञेय द्वारा सम्पादित 'तारसप्तक' से मानी जाती है और सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' को ही ‘प्रयोगवाद' का जनक माना जाता है। 'तारसप्तक' की भूमिका में अज्ञेय ने स्पष्ट लिखा है कि “प्रयोग सभी कालों के कवियों ने किये हैं। यद्यपि किसी एक काल में किसी विशेष दिशा में प्रयोग करने की प्रवृत्ति स्वाभाविक ही है किन्तु कवि क्रमशः अनुभव करता आया है कि जिन क्षेत्रों में प्रयोग हुए है उनसे आगे बढ़कर अब उन क्षेत्रों का अन्वेषण करना चाहिए, जिन्हें अभी नहीं छुआ गया है या जिनको अभेद मान लिया गया है।” इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रयोगवाद ज्ञात से अज्ञात की ओर बढ़ने की बौद्धिक जागरुकता है।


‘प्रयोगवाद' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग नन्ददुलारे वाजपेयी ने अपने निबन्ध ‘प्रयोगवादी रचनाएँ’ में किया। उनका मत है कि 'पिछले कुछ समय से ही हिन्दी काव्य क्षेत्र में कुछ रचनाएँ हो रही हैं। जिन्हें किसी सुलभ शब्द के अभाव में ‘प्रयोगवादी' रचना कहा जा सकता है। यद्यपि यह सत्य है कि वाजपेयी जी के नामकरण पर, अज्ञेय ने दूसरा सप्तक की भूमिका में लिखा और तारसप्तक की रचनाओं को प्रयोगवादी मानने से इनकार कर दिया किन्तु तारसप्तक के कवियों के वक्तव्यों में प्रयोग शब्द की पुनरावृत्ति से यह नाम चल पड़ा।


प्रयोगवाद विशेषतः नये-नये प्रयोगों को महत्त्व देता है जिसमें नव्य चेतना, नईभाषा, भावाभिव्यक्ति, शिल्प सौन्दर्य, प्रतीक विधान, बिम्बविधान, सब में नवीनता का चमत्कार दिखाई देता है। अज्ञेय द्वारा सन् 1947 में प्रकाशित 'प्रतीक' पत्रिका से प्रयोगवाद को और बल मिला। सन् 1943 में ‘तारसप्तक' के प्रकाशन के बाद, सन् 1951 दूसरा सप्तक, सन् 1959 में तीसरा सप्तक और सन् 1979 में चौथा सप्तक का प्रकाशन भी अज्ञेय ने ही किया जिनमें सात-सात कवियों को रखा गया था।


इनमें प्रयोगवादी और नयी कविता के कवि इतने घुल मिल गये हैं कि उनको अलग-अलग करना सम्भव नहीं है क्योंकि जो कवि प्रयोगवादी थे वे आगे चलकर नयी कविता में भी लेखन करने लगे और उसके आगे भी लिखते रहे। इसीलिए प्रयोगवाद और नयी कविता में कोई विशेष अन्तर नहीं दिखता और यही कारण है कि अधिकांश विद्वानों ने प्रयोगवाद के विकास काल को 'नयी कविता' और 'नयी कविता' के प्रारम्भिक अवस्था को प्रयोगवाद कहा है।


 डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त का मत है कि “प्रारम्भ में जब कवियों का दृष्टिकोण एवं लक्ष्य स्पष्ट नहीं था नूतनता की खोज के लिए केवल प्रयोग की घोषणा की गई थी, तो इसे प्रयोगवाद कहा गया।"


प्रयोगवाद और 'नयी कविता' की समय सीमा के सन्दर्भ में यदि विचार करे तो तारसप्तक के प्रकाशन वर्ष सन् 1943 से 1950 तक की कविताओं को प्रयोगवादी और सन् 1950 के बाद की कविताओं को नयी कविता कह सकते हैं। क्योंकि सन् 1952 में इलाहाबाद से प्रसारित रेडियो वार्ता में सर्वप्रथम अज्ञेय ने ही 'नयी कविता' शब्द का प्रयोग किया था। इस प्रकार प्रयोगवाद और नयी कविता एक दूसरे से इस प्रकार जुड़े हुए है कि उन्हें अलगाना असम्भव सा है फिर भी दोनों में कुछ मौलिक अंतर भी दृष्टिगत होता है ।


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   प्रयोगवाद की प्रमुख विशेषताएँ


प्रयोगवाद की प्रमुख प्रवृतियाँ अथवा विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-


(1). वैयक्तिकता


             वैयक्तिकतावादी प्रवृत्ति वैसे तो आधुनिक हिन्दी साहित्य के सभी कालों में देखी जा सकती है। किन्तु प्रयोगवाद में घोर अहं निष्ठ व्यक्तिवाद ऐसा जकड़ गया है कि सामाजिक जीवन के साथ सामान्जस्य नहीं हो सकता । प्रयोगवादी काव्य का मूल स्वर व्यक्तिवादी है इसी कारण यह अपने में ही केन्द्रित होकर रह गया और समाज से कट गया है। इस सम्बन्ध में डॉ.शिवदान सिंह चौहान इन कवियों की वैयक्तिकता के सम्बन्ध में लिखा है कि साधारणतया प्रयोगवादी कविताओं में एक दयनीय प्रकार की झुंझलाहट, खीज, कुंठा, किशोर औद्धत्य और हीन भाव ही व्यक्त हुआ है। जो कवि के व्यक्तित्व को प्रमाणित करने का नहीं, खण्डित करने का मार्ग है। महान कविता का जन्म सारे संसार को, समाज को जीवन के प्रगतिशील आदर्शों और नैतिक भावनाओं को एक उदण्ड और छिछोरे बालक की तरह मुँह बिचकाने से नहीं होता। सामाजिक बन्धनों के प्रति व्यक्तिवादी प्रतिवाद का यह तरीका स्वांग बनकर ही रह गया है । भारतभूषण अग्रवाल की कुछ पंक्तियाँ देखिए -


साधारण नगर के 

एक साधारण घर में 

मेरा जन्म हुआ 

बचपन बीता अति साधारण 

साधारण खान पान



(2). अति नग्न यथार्थवादी दृष्टि - 


              ये कवि अपने भोगे हुए यथार्थ को ज्यों प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं परिणामतः दूषित मनोवृत्तियों का चित्रण करने में भी ये कवि का त्यों अपनी शान समझते हैं। फ्रायड और युंग जैसे मनोवैज्ञानिकों के प्रभाव के कारण इनकी कविताओं में ‘दमित वासनाओं’ एवं ‘कुंठाओं' का चित्रण हुआ है। यथा शकुन्तला माथुर की 'सुहागबेला' नामक कविता देखिए -


चली आई बेला सुहागिन पायल पहने 

 बाण बिद्ध हरिणी सी 

बाहों में सिमै जाने की उसने की लिपेै जाने की 

मोती की घड़ी समान...


(3). वाद, विचारधारा और सिद्धान्त से मुक्ति


               प्रयोग का कोई वाद नहीं है और न ही वह किसी विशिष्ट विचारधारा या सिद्धान्त को मानता है अपितु वह सबसे मुक्त है। प्रयोग को महत्त्व देता है। प्रयोगवाद के प्रवर्तक अज्ञेय ने स्वीकार किया था कि प्रयोग का कोई वाद नहीं है। शायद इसी कथ्य को ध्यान में रखते हुए नामवर सिंह ने 'वाद के विरुद्ध विद्रोह' को प्रयोगवाद की सर्व प्रमुख विशेषता मानी है। जीवन संघर्ष में प्रयोगवादी किसी वाह्य सत्य, वैज्ञानिक, दर्शन आदि की उपयोगिता नहीं मानते। उनका मानना है कि जिस विचारधारा के सहारे हम अपने जीवन पथ पर चलने का निर्णय करते हैं वह कब तक हमारे साथ चलेगा, अर्थात् उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। अज्ञेय 'साधना का सत्य' शीर्षक कविता में लिखते हैं कि-


यह जो दिया लिये तुम चले खोजने सत्य, बताओं 

क्या प्रबन्ध कर चले 

कि जिस बात का तुम्हें भरोसा

वही जलेगी सदा 

कम्पित, उज्ज्वल, एकरूप, निर्धूम् ?


(4). बौद्धिकता की प्रधानता - 


         प्रयोगवादी कवियों में भावना की जगह विचार की प्रधानता है। जीवन की जटिलताओं को भोगने के कारण इन कवियों ने बौद्धिकता को आत्मसात किया है। इस प्रवृत्ति के कारण इनकी कविताएँ नीरस हो गई है तथा अस्पष्टता एवं दुरुहता आ गई है। उनकी कविताएँ साधारणीकरण में बाधक है और विशेषीकरण की ओर अग्रसर हैं, यथा - अज्ञेय अतिबौद्धिकता के कारण प्रेयसी को निरखने में प्रेम भावना की अपेक्षा दबी वासना की विकृति स्वीकारते हुए लिखते है कि-


आओ  बैठो

क्षण भर तुम्हें निहारुँ

झिझक न हो कि निरखना 

दबी वासना की विकृति है।


           धर्मवीर भारती प्रयोगवादी बौद्धिकता का समर्थन करते हुए कहते हैं कि “प्रयोगवादी कविता में भावना है, किन्तु हर भावना के सामने एक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है इसी प्रश्न चिह्न को आप बौद्धिकता कह सकते हैं। सांस्कृतिक ढाँचा चरमरा उठा है और यह प्रश्न चिह्न उसी की ध्वनि मात्र है।”


(5). सत्य के लिए अन्वेषण - 


            सत्य का अन्वेषण प्रयोगवाद की प्रमुख विशेषता कही जा सकती है। अज्ञेय का आशय है कि प्रयोगवादी कवि उस सत्य की खोज करता है जिसे वह काव्य में अभिव्यक्त करना चाहता है आलोचक नामवर सिंह ने 'सत्य के लिए अन्वेषण' को प्रयोगवाद को दूसरी विशेषता स्वीकारते हैं। जब वह विचार से मुक्त हो गया तो सत्य क्या है इसकी खोज भी आवश्यक है।


(6). निराशावाद - 


           प्रयोगवादी कविता में निराशा की भावना है वह मात्र वर्तमान में जीता है और उसी में सब कुछ पाने की लालसा रखता है डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त का विचार है कि “प्रयोगवादी कवि की स्थिति उस व्यक्ति की भाँति है जिसे यह विश्वास हो कि अगले क्षण प्रलय होने वाली है अतः वह वर्तमान क्षण में ही सब कुछ कर लेना चाहता है।"


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(7). उपमानों की नवीनता - 


         प्रयोगवादी कवि नये - नये प्रयोगों के पक्षधर रहे हैं इसीलिए इन कवियों को पुराने उपमान अरुचिकर और व्यर्थ प्रतीत होते हैं उन्हें नये-नये उपमानों, प्रतीकों और रूपकों से लगाव हैं। कुछ उदाहरण देखिए-


मेरे सपने इस तरह टूट गये, 

जैसे भुँजा हुआ पापड़।।


प्राकृतिक प्रतीकों के उदाहरण भी खूब मिलते हैं -  


पूर्व दिशा में हड्डी के रंग वाला बादल लेटा है।।


(8). भाषा-शैली - 


          प्रयोगवादी कवियों में भाषा की दृष्टि से विविधता है। जो भाषा पहले अस्पष्ट एवं दुरूह थी, बाद में वह बोलचाल के निकट पहुँचकर जनसामान्य की भाषा बनती नजर आती है। कठिन और सरल शब्दों के साथ-साथ लक्षणा और व्यंजना के काव्य दुरूहता भी है। शैली गेय के साथ-साथ गद्यात्मक है यथा - अज्ञेय की 'साँप' शीर्षक कविता की शैली देखिए -


सांप !

तुम सभ्य तो हुए नहीं 

नगर में 

बसना भी नहीं आया। 

एक बात पूँछँ उत्तर दोगे ? 

तब से सीखा डसना, 

विष कहाँ पाया ?


(9). छन्दो विधान


         छन्द की दृष्टि से तो मुक्त छन्द का प्रचलन छायावाद में ही हो गया था किन्तु इन कवियों ने मुक्त छन्द के साथ नवीन लय को महत्त्व दिया अज्ञेय ने 'शब्द' को ही ‘काव्य’ कहा है और वे शब्द चाहे जिस रूप में प्रस्तुत किये जाये। उन्होंने कहा कि 'मेरी खोज भाषा की खोज नहीं है केवल शब्दों की खोज है। भाषा का उपयोग मैं करता हूँ, निस्संदेह, लेकिन कवि के नाते जो मैं कहता हूँ वह भाषा के द्वारा नहीं केवल शब्दों के द्वारा । मेरे लिए यह भेद गहरा महत्त्व रखता है। 


(10). बिम्ब विधान


              बिम्ब विधान का सम्बन्ध भाषा की सर्जनात्मक शक्ति से है। इस दृष्टि से यह पूर्ण सफल हैं अज्ञेय प्राकृतिक बिम्बों के धनी है तो मुक्तिबोध के यहाँ मानव स्थितियों से जुड़े बिम्ब अधिक है । इसीलिए प्रयोगवादी कवियों में मुक्तिबोध सर्वाधिक बेचैनी के वि कहलाते हैं उनकी फैंटेसी का सम्बन्ध स्वप्न और अवचेतन मन में घटने वाली बेतरतीब खण्डित बिम्बावलियों से है। प्रयोगवादी कवियों में प्रमुख रूप से सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय, गिरिजा कुमार माथुर, भारतभूषण अग्रवाल, नरेश मेहता, शमशेर बहादुर सिंह और गजानन माधव मुक्तिबोध को रखा जा सकता है। यद्यपि इनमें से बहुत से कवि नयी कविता में भी लेखन किया है।


(11). विद्रोह का स्वर: 


            इस कविता में विद्रोह का स्वर एक और समाज और परंपरा से अलग होने के रूप में मिलता है दूसरी ओर आत्मशक्ति के उद्घोष रूप में। परंपरा और रूढ़ि से मुक्ति पाने के लिये भवानी प्रसाद मिश्र कहते हैं:-


 ये किसी निश्चित नियम, क्रम की सरासर सीढ़ियाँ हैं

पांव रखकर बढ़ रहीं जिस पर कि अपनी पीढ़ियाँ हैं                 

         बिना सीढ़ी के बढ़ेंगे तीर के जैसे बढ़ेंगे।


(12). लघु मानव की प्रतिष्ठा: 


              प्रयोगवादी काव्य में लघु मानव की ऐसी धारणा को स्थापित किया गया है जो इतिहास की गति को अप्रत्याशित मोड़ दे सकने की क्षमता रखता है;


मैं रथ का टूटा पहिया हूं

लेकिन मुझे फेंको मत 

इतिहासों की सामूहिक गति 

सहसा झूठी पड़ जाने पर

क्या जाने 

सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले


(13). अनास्थावादी तथा संशयात्मक स्वर: 

 

                 डॉ. शंभूनाथ चतुर्वेदी ने अनास्थामूलक प्रयोगवादी काव्य के दो पक्ष स्वीकार किए हैं। एक आस्था और अनास्था की द्वंद्वमयी अभिव्यक्ति, जो वस्तुतः निराशा और संशयात्मक दृष्टिकोण का संकेत करती है। दूसरी, नितांत हताशापूर्ण मनोवृत्ति की अभिव्यक्ति।


अपनी कुंठाओं की 

  दीवारों में बंदी 

   मैं घुटता हूं।


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प्रयोगवादी कवि और  उनकी  रचनाएँ :-


क्रमांक कवि रचनाएँ
क्रमांक01. कविसच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' रचनाएँअसाध्य वीणा, हरी घास पर क्षण
क्रमांक02 कविगजानन माधव 'मुक्तिबोध' रचनाएँचाँद का मुंह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल
क्रमांक03. कविगिरिजा कुमार माथुर रचनाएँ मंजीर, नाश और निर्माण
क्रमांक04. कविधर्मवीर भारती  रचनाएँअँधा युग, कनुप्रिया, ठंडा लोहा

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