प्रगतिवाद का सामान्य परिचय देते हुए, प्रगतिवाद की प्रमुख प्रवृतियाँ या विशेषताएं बताइए ।

Sarvesh Sudhakar
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प्रगतिवाद का सामान्य परिचय और उसकी प्रमुख प्रवृत्तियाँ/विशेषताएँ
प्रगतिवाद का सामान्य परिचय और उसकी प्रमुख प्रवृत्तियाँ 

           प्रगतिवाद का परिचय


कुछ लोग प्रगतिवाद और प्रगतिशील साहित्य में विरोध करते है। इनका मानना है कि प्रगतिशील शब्द अधिक व्यापक है और इसमें मानव के व्यापक सरोकार जुड़ते हैं और प्रगतिवाद शब्द केवल उस साहित्य का बोध कराता है जो मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित होकर या उसके आधार पर लिखा गया हो। वस्तुतः प्रगतिवाद और प्रगतिशील शब्द का झगड़ा कोरा बुद्धिविलास है। आज प्रगतिवाद शब्द से अभिप्राय उस साहित्यिक प्रवृत्ति से है, जिसमें एक प्रकार की इतिहास चेतना, सामाजिक यथार्थ दृष्टि, वर्ग चेतन विचारधारा, प्रतिबद्धता या पक्षधरता, गहरी जीवनासक्ति, परिवर्तन के लिये सजगता और एक प्रकार की भविष्योन्मुखी दृष्टि मौजूद हो। रूप के स्तर पर प्रगतिवाद एक सीधी-सहज-तेज - प्रखर, कभी व्यंग्यपूर्ण आक्रामक काव्यशैली का वाचक है।


वैसे प्रगतिशील साहित्य अंग्रेजी के 'प्रोग्रेसिव लिटरेचर' का अनुवाद है। अंग्रेजी में इस शब्द का प्रयोग 1935 ई. के आसपास हुआ जब पेरिस में 'प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन' नामक संस्था का पहला अधिवेशन हुआ। इसके एक वर्ष बाद सन् 1936 में सज्जाद जहीर और डॉ. मुल्कराज आनन्द के प्रयत्नों से भारतवर्ष में भी 'प्रगतिशील लेखक संघ' संस्था की शाखा खुली और प्रेमचन्द की अध्यक्षता में लखनऊ में प्रथम अधिवेशन हुआ।इसमें उन्होंने कहा था, "साहित्य का उद्देश्य दबे-कुचले हुए वर्ग की मुक्ति का होना चाहिए ।"


दूसरा अधिवेशन कलकत्ते में हुआ। जिसके अध्यक्ष विश्व कवि रविन्द्रनाथ टैगोर थे।


और इस तरह भारत में इस साहित्यिक आन्दोलन का उद्भव हुआ। प्रगतिशील प्रयासों ने हमारी आँखे खोल दीं। हमारा हिन्दी साहित्य भी प्रेमचन्द, पन्त, दिनकर आदि के अथक प्रयासों से प्रगतिवाद की ओर मुड़ा है।


इस प्रकार हिन्दी  साहित्य में प्रगतिवाद का आरंभ 'प्रगतिशील लेखक संघ' द्वारा 1936 ई० में लखनऊ में आयोजित उस अधिवेशन से होता है जिसकी अध्यक्षता प्रेमचंद ने की था। इसका समय 1936 ई. से 1943 ई. तक माना जाता है। प्रगतिवाद वास्तव में छायावाद की प्रतिक्रिया है।छायावाद जहां कल्पना पर बल देता था वही प्रगतिवाद यथार्थ का चित्रण करता है।

समाज का प्रत्येक वर्ग प्रगति करना चाहता है। यह वाद किसान, मजदूर तथा समाज के शोषित वर्गों के प्रति समानता पर बल देता हैं। साम्यवादी विचारधारा के आधार पर समाज को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है-शोषक वर्ग और शोषित वर्ग ।


प्रगतिवाद का अभिप्राय


 डॉ. नगेन्द्र-   “प्रगतिवाद साम्यवाद का पोषक है और पूंजीवाद का शत्रु है, बल्कि यों कहें कि प्रगतिवाद साम्यवाद की ही अभिव्यक्ति है।"


 श्री लक्ष्मीकांत वर्मा-  प्रगतिवाद सामाजिक यथार्थवाद के नाम पर चलाया गया वह साहित्यिक आंदोलन है जिसमें जीवन और यथार्थ के वस्तु सत्य को उत्तर छायावाद में प्रश्रय मिला और जिसने सर्वप्रथम यथार्थवाद की ओर समस्त साहित्यिक धारा को अग्रसर होने की प्रेरणा दी।"


संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि राजनीति के क्षेत्र में जो साम्यवाद है, सामाजिक क्षेत्र वह समाजवाद, दर्शन के क्षेत्र में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और साहित्य के क्षेत्र में वह प्रगतिवाद है।


प्रगतिवाद की परिभाषा


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, " जो भाव-धारा राजनीति के क्षेत्रों में साम्यवाद है, वही साहित्य में प्रगतिवाद हैं।"


शिवकुमार शर्मा के अनुसार, " मार्क्सवादी या साम्यवादी दृष्टिकोण के अनुसार निर्मित काव्यधारा प्रगतिवाद हैं।


प्रगतिवाद साहित्य जनजीवन का साहित्य है। प्रगतिवादी कवि कल्पना जगत को पूरे यथार्थ की भूमि से जन- जीवन के महासागर से संघर्ष की मुक्ताएँ चुनता है।उसका उद्देश्य कविता को जन-जीवन के निकट लाना हैं।


 प्रगतिवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ/विशेषताएँ


समाज और समाज से जुड़ी समस्याओं यथा गरीबी, अकाल, स्वाधीनता, किसान-मजदूर, शोषक- शोषित संबंध और इनसे उत्पन्न विसंगतियों पर जितनी व्यापक संवेदनशीलता इस धारा की कविता में है, वह अन्यत्र नहीं मिलती। यह काव्यधारा अपना संबंध एक ओर जहां भारतीय परंपरा से जोड़ती है वहीं दूसरी ओर भावी समाज से भी। वर्तमान के प्रति वह आलोचनात्मक यथार्थवादी दृष्टि अपनाती है। प्रगतिवादी काव्यधारा की प्रमुख प्रवृत्तियां इस प्रकार हैं:-


(1). सामाजिक यथार्थवाद : 

             

              इस काव्यधारा के कवियों ने समाज और उसकी समस्याओं का यथार्थ चित्रण किया है। इस युग के कवियों ने छायावादी कवियों की तरह अपने सुख-दुःख को महत्व नहीं दिया है। उसके स्थान पर उन्होंने समाज की गरीबी, भुखमरी, अकाल और बेरोजगारी आदि सामाजिक यथार्थ का चित्रण किया है। समाज में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक विषमता के कारण दीन-दरिद्र वर्ग के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि के प्रसारण को इस काव्यधारा के कवियों ने प्रमुख स्थान दिया और मजदूर, कच्चे घर, मटमैले बच्चों को अपने काव्य का विषय चुना ।


सड़े घूर की गोबर की बदबू से दबकर

महक जिंदगी के गुलाब की मर जाती है

                     ....केदारनाथ अग्रवाल


ओ मजदूर! ओ मजदूर !!

तू सब चीजों का कर्ता, तू हीं सब चीजों से दूर

ओ मजदूर ! ओ मजदूर !!


(2). मानवतावाद का प्रकाशन : 

              

              प्रगतिवादी कवि धर्म और ईश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में धर्म और ईश्वर को शोषण का हथियार माना है। वे ईश्वर से अधिक मानवीय शक्ति को महत्व देते हैं।

वह मानवता की अपरिमित शक्ति में विश्वास प्रकट करता है और ईश्वर के प्रति अनास्था प्रकट करता है; धर्म उसके लिए अफीम का नशा है।


जिसे तुम कहते हो भगवान- 

जो बरसाता है जीवन में रोग, 

शोक, दुःख दैन्य अपार 

उसे सुनाने चले पुकार


(3). क्रांति का आहवाहनः


         इस युग के कवियों ने समाज के हर वर्ग के प्रति किए जाने वाले शोषण के विरुद्ध क्रांति का स्वर बुलंद किया है।


प्रगतिवादी कवि समाज में क्रांति की ऐसी आग भड़काना चाहता है, जिसमें मानवता के विकास में बाधक समस्त रूढ़ियां जलकर भस्म हो जाएं-


देखो मुट्ठी भर दानों को, तड़प रही कृषकों की काया । 

कब से सुप्त पड़े खेतों से, देखो 'इन्कलाब' घिर आया ॥


कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ

जिससे उथल पुथल मच जाए


(4). शोषकों के प्रति आक्रोश: 


               प्रगतिवाद दलित एवं शोषित समाज के 'खटमलों'-पूंजीवादी सेठों,साहूकारों और राजा-महाराजाओं के शोषण के चित्र उपस्थित कर उनकी मानवता का पर्दाफाश करता है-


ओ मदहोश बुरा फल हो, शूरों के शोणित पीने का 

देना होगा तुझे एक दिन, गिन-गिन मोल पसीने का ॥


(5).शोषितों को प्रेरणा : 


             प्रगतिवादी कवि शोषित समाज को स्वावलम्बी बनाकर अपना उद्धार करने की प्रेरणा देता है-


न हाथ एक अस्त्र हो, न साथ एक शस्त्र हो ।

न अन्न नीर वस्त्र हो, हटो नहीं, इटो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो।


वह शोषित में शक्ति देखता है और उसे क्रांति में पूरा विश्वास है। इस प्रकार प्रगतिवादी कवि को शोषित की संगठित शक्ति और अच्छे भविष्य पर आस्था है-


मैंने उसको जब-जब देखा लोहा देखा

लोहा जैसा तपते देखा गलते देखा दलते देखा 

मैंने उसको गोली जैसे चलते देखा


(6). रूढ़ियों का विरोध :-

       

               इस धारा के कवि बुद्धिवाद का हथौड़ा लेकर सामाजिक कुरीतियों पर तीखे प्रहार कर उनको चकनाचूर कर देना चाहते हैं-


गा कोकिल! बरसा पावक कण

नष्ट-भ्रष्ट हो जीर्ण पुरातन        ... पंत


(7). तत्कालीन समस्याओं का चित्रण : 


               प्रगति का उपासक कवि अपने समय की समस्याओं जैसे- बंगाल का अकाल आदि की ओर आंखें खोलकर देखता है और उनका यथार्थ रूप उपस्थित कर समाज को जागृत करना चाहता है-


बाप बेटा बेचता है

भूख से बेहाल होकर,

धर्म धीरज प्राण खोकर

हो रही अनरीति, राष्ट्र सारा देखता है।


(8).मार्क्सवाद का समर्थन: 

      

               इस धारा के कुछ कवियों ने मात्र साम्यवाद के प्रवर्तक कार्ल मार्क्स का तथा उसके सिद्धांतों का समर्थन करने हेतु प्रचारात्मक काव्य ही लिखा है-


साम्यवाद के साथ स्वर्ण युग करता मधुर पदार्पण

और साथ ही साम्यवादी देशों का गुणगान भी किया है-

लाल रूस का दुश्मन साथी! दुश्मन सब इंसानों का


(9). नया सौंदर्य बोध: 

         

               प्रगतिवादी कवि श्रम में सौंदर्य देखते हैं। उनका सौंदर्य-बोध सामाजिक मूल्यों और नैतिकता से रहित नहीं है। वे अलंकृत या असहज में नहीं, सहज सामान्य जीवन और स्थितियों में सौंदर्य देखते हैं। खेत में काम करती हुई किसान नारी का यह चित्र इसी तरह का है-


बीच-बीच में सहसा उठकर खड़ी हुई वह युवती सुंदर

लगा रही थी पानी झुककर सीधी करे कमर वह पल भर


(10). व्यंग्य

             

             सामाजिक, आर्थिक वैषम्य का चित्रण करने से रचना में व्यंग्य आ जाना स्वाभाविक है। व्यंग्य ऊपर-ऊपर हास्य लगता है किंतु वह अंततः करुणा उत्पन्न करता है। इसीलिए सामाजिक व्यंग्य अमानवीय शोषण सत्ता का सदैव विरोध करता है। प्रगतिशील कवियों में व्यंग्य तो सबके यहां मिल जाएगा किंतु नागार्जुन इस क्षेत्र में सबसे आगे हैं। एक देहाती मास्टर दुखरन, उसके शिष्यों और मदरसे की यह तस्वीर नागार्जुन ने इस प्रकार खींची है-


घुन खाए शहतीरों पर की बारह खड़ी विधाता बांचे 

फटी भीत है, छत है चूती, आले पर बिस्तुइया नाचे 

लगा-लगा बेबस बच्चों पर मिनट-मिनट में पांच तमाचे 

इसी तरह से दुखरन मास्टर गढ़ता है आदम से सांचे ।


(11). प्रकृति चित्रण : 

              

                मानव समाज की भांति प्रकृति के क्षेत्र में भी प्रगतिवादी कवि सहज स्थितियों में सौंदर्य देखता है। उसका सौंदर्य बोध चयनवादी नहीं। प्रगतिवादी कवियों ने प्रकृति और ग्राम जीवन के अनुपम चित्र खींचे हैं जिनमें रूप-रस-गंध-वर्ण के बिम्ब उभरे हैं। नागार्जुन का 'बादल को घिरते देखा है', केदारनाथ अग्रवाल का 'बसंती हवा' और त्रिलोचन का 'धूप में जग- रूप सुंदर' उत्कृष्ट कविताएं हैं।


(12). प्रेम :- 

         

                  प्रगतिवादी कवियों ने प्रेम को सामाजिक पारिवारिक रूप में देखा है। वर्ग-विभक्त समाज में प्रेम सहज नहीं हो पाता। प्रेम वर्ग-भेद, वर्ण-भेद को मिटाता है। प्रगतिवादी कवि प्रेम की पीड़ा का एकांतिक चित्र करते हैं। किंतु वह वास्तविक जीवन संदर्भों में होता है। अतः उनका एकांत भी समाजोन्मुख होता है; जैसे त्रिलोचन का यह अकेलापन-


आज मैं अकेला हूं, अकेले रहा नहीं जाता 

जीवन मिला है यह, रतन मिला है यह 

फूल में मिला है या धूल में मिला है यह 

मोल तोल इसका अकेले कहा नहीं जाता 

आज मैं अकेला हूं


(13). नारी शोषण के प्रति मुक्ति का स्वर : 


            इस युग के कवियों ने नारी को भोग की वस्तु नहीं माना है, वे उसे माँ, देवी, बहिन, सखी, सहचरी | आदि कहकर समाज में सम्मान दिलाया है। पंतजी ने नारी को शोषण मुक्ति के लिए कहा है कि-


उदाहरण- मुक्त करो! हे नर मुक्त करो।


प्रगतिवादी कवि के लिए मजदूर तथा किसान के समान नारी भी शोषित है, जो युग-युग से सामंतवाद की कारा में पुरुष की दासता की लौहमयी जंजीरों से जकड़ी है। स्वतंत्र व्यक्तित्व खो चुकी है और केवल मात्र रह गई है पुरुष की वासना तृप्ति का उपकरण। इसलिए वह उसकी मुक्ति चाहता है- 


योनि नहीं है रे नारी! वह भी मानवी प्रतिष्ठित

उसे पूर्ण स्वाधीन करो, वह रहे न नर पर अवसित


अधिकांश प्रगतिवादियों का नारी-प्रेम उच्छृंखल और स्वछंद है- 


मैं अर्थ बताता द्रोहभरे यौवन का 

मैं वासना नग्न को गाता उच्छृंखल


प्रगतिवादी कवि ने नारी के सुकोमल सौंदर्य की उपेक्षा करके उसके स्थुल शारीरिक सौंदर्य को ही अधिक उकेरा है। उसने नारी की कल्पना कृषक बालाओं व मजदूरनियों में की है।


(14). प्रतीकों का प्रयोग:


              प्रगतिवादी कवियों ने अपनी भावनाओं को स्पष्ट करने के लिए प्रतीकों का सहारा लिया है।


(15). सरल भाषा का प्रयोग:


           इस युग के कवियों ने अपनी रचनाओं में सरल और सुगम भाषा का प्रयोग किया है। कहीं- कहीं पर अंग्रेजी और उर्दू भाषा के शब्द भी दिखाई देते हैं।



                                    निष्कर्ष


प्रगतिवाद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसने उपेक्षित दलित वर्ग को काव्य का विषय बनाया है और इस प्रकार साहित्य को एक व्यापक यथार्थवादी आयाम प्रदान किया। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, " इनके सिद्धांत और उद्देश्य बहुत सुन्दर हैं, लेकिन ये लोग कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़े हुए है, यही जरा खटकता है। अगर ये लोग दल द्वारा परिचालित होना छोड़ दें तो सब कुछ ठीक हो जायेगा।"


अतः निःसंदेह कहा जा सकता है कि प्रगतिवाद का लक्ष्य महान् है। यह मुट्टठी भर उद्योगपतियों को खरी-खोटी सुनाकर बहुसंख्यक शोषितों के प्रति संवेदना व्यक्त करता है।शोषित वर्ग के अभाव जर्जन अंत:करण की मूक व्यथा-कथा को वाणी प्रदान करने का इसका प्रयास सराहनीय है। बाबू गुलाबराय ने लिखा हैं, "प्रगतिवाद हमको स्वार्थ-परामय व्यक्तिवाद से हटाकर समष्टिवाद की ओर ले गया है। यही प्रगतिवाद का सबसे 'बड़ा' प्रदेय है और यही उसके महत्व का सबसे बड़ा कारण हैं।"


 प्रगतिवाद के आलोचक आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी को भी इसकी मंगल-विधायिनी शक्ति से प्रभावित होकर लिखना पड़ा हैं,  "साहित्य के सामाजिक लक्ष्यों और उद्देश्यों का विज्ञापन करने वाली यह पद्धित साहित्य पर बहुत कुछ उपकार भी कर सकी है। उसने हमारे युवकों को एक नई तेजस्विता भी प्रदान की है और एक नया आत्मबल भी दिया हैं।" उसने दो वस्तुएँ मुख्य रूप से दी है। प्रथम यह कि काव्य साहित्य का समन्वय सामाजिक वास्तविकता से है और वही साहित्य मूल्यवान है जो सजग और संवदेनशील है, द्वितीय यह कि जो साहित्य सामाजिक वास्तविकता से जितना ही दूर होगा, वह उतना ही काल्पनिक और प्रतिक्रियावादी कहा जायेगा। लक्ष्मीनारायण वार्ष्णेय के अनुसार, "क्योंकि काव्य- शिल्प की दृष्टि से उसमें अनेक नवीन बातों का समावेश हुआ, अनेक प्रयोग हुए, इसलिए प्रकार की सभी नवीन कविताओं की प्रकृति को "प्रयोगवाद" की संज्ञा प्रदान की गई।"


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(3). “कामायनी महाकाव्य है।" इस कथन को स्पष्ट कीजिए| कामायनी का महाकाव्यत्व


(4). प्रयोगवाद को उदाहरण सहित समझाइये| प्रयोगवाद और उसकी प्रवृतियाँ अथवा विशेषताएँ बताइये।



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