वर्णनात्मक,ऐतिहासिक, तुलनात्मक,प्रयोगात्मक और संरचनात्मक भाषा विज्ञान की अध्ययन की दिशाएं का विस्तृत विवेचन कीजिए ।

Sarvesh Sudhakar
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वर्णात्मक,एतिहासिक, तुलनात्मक,प्रयोगात्मक और संरचनात्मक भाषा विज्ञान की अध्ययन की दिशाएं का विस्तृत विवेचन कीजिए ।
भाषा विज्ञान की अध्ययन की दिशाएँ का विस्तृत विवेचन कीजिए । 


        भाषा, हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके बिना हमारी भावाभिव्यक्ति अधूरी है। यह एक ऐसी रहस्यमयी और अद्वितीय दुनिया है जिसे खोजना हमारे लिए अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण है। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम भाषा विज्ञान की  अध्ययन की दिशाएँ अथवा पद्धतियों की बात करेंगे, जो हमें भाषा की गहराइयों में जाने का मौका देती हैं।

      भाषा विज्ञान का प्रारंभिक अध्ययन वर्णनात्मक पद्धति के माध्यम से आरंभ हुआ, जिसमें हम भाषा के वर्ण, शब्द, और वाक्यों के संरचना को अध्ययन करते हैं। इसके साथ ही, हम ऐतिहासिक पद्धति के माध्यम से भाषा के कालक्रमिक विकास की जाँच करते हैं, जिससे हमें भाषाओं के बदलते रूपों का पता चलता है। तुलनात्मक पद्धति में हम विभिन्न भाषाओं की तुलना करके उनके सामान्यता और विशेषता को समझते हैं। प्रयोगात्मक पद्धति भाषा के व्यवहारिक पहलुओं का अध्ययन करती है, जिसमें भाषा के वाचकों के बोलने के तरीकों की जाँच की जाती है और संरचनात्मक पद्धति में हम भाषा की संरचना को विश्लेषण करते हैं, जिससे हमें भाषा के सूक्ष्म चिन्तन का पता चलता है।



भाषा विज्ञान की अध्ययन की दिशाएँ


           इसे भाषा विज्ञान अध्ययन की प्रणालियाँ भी कहते हैं। भाषा विज्ञान में एक भाषा, दो भाषाओं अथवा विविध भाषाओं का विशिष्ट अध्ययन करते हैं। भाषा के उच्चरित या लिखित अथवा दोनों स्वरूपों पर चिन्तन किया जाता है।भाषा विज्ञान की अध्ययन की प्रमुख दिशाएं इस प्रकार की जा सकती है- 

1. वर्णनात्मक पद्धति (Descriptive Linguistics)

2. ऐतिहासिक पद्धति (Historical Linguistics)

3. तुलनात्मक पद्धति(Comparative Linguistics)

4. प्रयोगात्मक पद्धति (Experimental Linguistics)

5. संरचनात्मक पद्धति (Structural Linguistics)

         ये पांच दिशाएँ भाषा विज्ञान के प्रकार माने गये हैं। इसलिए इन्हें कुछ लोग भाषा विज्ञान की शाखाएँ भी कहते हैं।


(1). वर्णनात्मक पद्धति  :-


          जब किसी भाषा के विशिष्ट काल का संगठनात्मक अध्ययन किया जाता है, तो उसे वर्णनात्मक अध्ययन कहते हैं।वर्णनात्मक भाषा विज्ञान का उदाहरण सुप्रसिद्ध संस्कृत वैयाकरणी महर्षि पाणिनि की रचना "अष्टाध्यायी" है। विद्वान पाणिनी के अष्टाध्यायी में इसी प्रकार का भाषा अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।

            इसमें भाषा के संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया तथा विशेषण आदि की वर्णनात्मक समीक्षा करते हुए ध्वनि, शब्द, वाक्य आदि पर विचार किया जाता है। भाषा की सब इकाइयों पर अध्ययन करते हुए उनसे सम्बन्धित नियम निर्धारित किया जाता है। भाषा के सीमित काल का ही अध्ययन होता है, फिर भी इसका प्राचीन काल से विशेष महत्त्व रहा है। इस प्रकार के अध्ययन में भाषा के साधु असाधु रूपों पर चिन्तन करते हुए उसके ध्वनि, शब्द आदि इकाइयोंरूपी शरीरांग के साथ उसकी अर्थरूपी आत्मा पर भी विचार किया जाता है। वर्तमान समय में वर्णनात्मक पद्धति के भाषा अध्ययन की ओर विद्वानों का विशेष झुकाव दिखाई पड़ता है।  

          अमेरिका में इस पध्दति का अधिक विकास हुआ है। वर्णात्मक शाखा व्याकरण के अधिक निकट है।ग्लीसन ने इस शाखा को भाषा विज्ञान की 'मूल शाखा' कहा है (Basic Branch of Linguistics Science) इस शाखा के पश्चिमी अन्य भाषा विज्ञानी है ऑटोजस्परसन, ब्लूमफिल्ड, हेनी स्वीट और जॉर्ज ग्रियर्सन । भारतीय विद्वानों में डॉ. तास्पोरवाला और डॉ. सिद्धेश्वर वर्मा प्रमुख हैं।


(2).ऐतिहासिक पद्धति :-


             इस पद्धति में भाषा विशेष के कालक्रमिक विकास का अध्ययन किया जाता है। यदि किसी विशेष भाषा के कालों के विवरणात्मक अध्ययन को कालक्रम से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो ऐतिहासिक अध्ययन हो जाएगा।

            भाषा विकास या परिवर्तन की विभिन्न धाराओं का अध्ययन इसी पद्धति में होता है। भारतीय आर्य भाषाओं के विकास क्रम में हिन्दी का अध्ययन करना चाहें तो इसी पद्धति से वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत,प्राकृत, अपभ्रंश भाषाओं पर विचार करते हुए हिन्दी भाषा का अध्ययन किया जाएगा। यदि हिन्दी शब्दों का उद्भव और विकास जानना चाहेंगे तो संस्कृत, पाली, प्राकत और अपभ्रंश के साथ हिन्दी का कालक्रमिक अध्ययन करना होगा: यथा कर्म (संस्कृत) > कम्म (प्राकृत) काम (हिन्दी) । 

          भाषा चिर परिवर्तनशील है। समय तथा स्थान परिवर्तन के साथ भाषा में परिवर्तन होना स्वभाविक ही है। समय-समय पर भाषा की ध्वनियों, शब्दों तथा वाक्यों में ही नहीं अर्थ में भी परिवर्तन होता रहता है। यह परिवर्तन हमें ऐतिहासिक पद्धति के अध्ययन से ही ज्ञात होता है।


(3). तुलनात्मक पद्धति :-


              भाषा अध्ययन की जिस पद्धति में दो या दो से अधिक भाषाओं की ध्वनियों, वर्णों, शब्दों, पदों वाक्यों और अर्थों आदि की तुलना की जाती है, उसे भाषा अध्ययन की तुलनात्मक पद्धति कहते है।

         इस अध्ययन के अन्तर्गत एक भाषा के विभिन्न कालों के रूपों का तुलनात्मक अध्ययन कर उसकी विकासात्मक स्थिति का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त करते हैं। एक भाषा की विभिन्न बोलियों की समता-विषमता जानने के लिए भी भाषा- अध्ययन की इस पद्धति से ही उभरा है। इसका प्रबल प्रमाण है कि प्रारम्भ में इसके लिए तुलनात्मक भाषा विज्ञान (Commparative Philology) नाम दिया गया था। वह भी सत्य है कि बिना तुलनात्मक अध्ययन दृष्टिकोण अपनाए किसी नियम का निर्धारण अत्यन्त कठिन होता है। 

       भाषा परिवार के निर्धारण में भी तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक होता है। भाषा की सरसता, सरलता या विशेषताओं को स्पष्टरूप से रेखांकित करने के लिए तुलनात्मक अध्ययन सर्वाधिक उपयोगी होता है।


(4). प्रयोगात्मक पद्धति :-


          भाषा अध्ययन का महत्त्व दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है। इसे देखते हुए भाषा अध्ययन की इस नई पद्धति का प्रारम्भ हुआ है। इसमें भाषा के जीवन्तरूप का व्यवहारिक ढंग से अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन किसी क्षेत्र विशेष से जुड़ा होता है। इसलिए इसे क्षेत्रीय कार्य (Field Work) कहते हैं। इस पद्धति के अध्ययन में अध्येता को किसी क्षेत्र विशेष में जाकर सम्बन्धित भाषाभाषी से निकट सम्पर्क करना होता है।

            प्रायोगिक अध्ययन में किसी भाषा या बोली की ध्वनियों, शब्दों वाक्यों के साथ बोलनेवाले की भाषा में प्रयुक्त मुहावरे, कहावतों आदि की प्रयोग-स्थिति भी अध्ययन किया जाता है। प्रयोगात्मक अध्ययन से ही विभिन्न बोलियों की सहजता, स्वाभाविकता तथा अभिव्यक्ति की स्पष्टता की बात सामने आ रही है जैसे-जैसे क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग की बात जोर पकड़ रही है वैसे वैसे इस पद्धति के अध्ययन में गति आ रही है।

            वर्तमान समय में विभिन्न विद्वानों की भाषा-विशेषताओं को जानने के लिए भी प्रयोगात्मक पद्धति अपनायी जाती है। आधुनिक भाषा विज्ञान में प्रयोगात्मक पद्धति के अध्ययन का विशेष महत्व है।


(5). संरचनात्मक पद्धति :-


             जिस पद्धति में भाषा की संरचना के आधार पर अध्ययन किया जाए उसे भाषा अध्ययन की संरचनात्मक पद्धति कहते हैं। भाषा अध्ययन की यह पद्धति भाषा की विभिन्न इकाइयों के सूक्ष्म चिन्तन पर आधारित है। इसमें भाषा का विवेचन और विश्लेषण संगठनात्मक दृष्ष्टिकोण से करते हैं। भाषा के संरचनात्मक अध्ययन में पारस्परिक सम्बद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है, वर्णनात्मक भाषा अध्ययन में भी यत्र तत्र संरचनात्मक रूप उभर आता है। 

           वर्णनात्मक पद्धति और संरचनात्मक पद्धति के अध्ययन में विशिष्ट अन्तर यह है कि वर्णनात्मक पद्धति में भाषा की इकायों का अध्ययन एकाकी रूप में किया जाता है, जबकि संरचनात्मक अध्ययन में विभिन्न इकाइयों के पारम्परिक सम्बन्ध पर भी विचार किया जाता है, यथा "काम" शब्द के संरचनात्मक अध्ययन में इसके विभिन्न ध्वनि चिह्नों क् + आ + म् + अ के लिखित तथा विभिन्न ध्वनियों क + आ + के उच्चरित रूप पर चिन्तन करते हैं। 

            इस प्रकार शब्द-संरचना के अध्ययन में उससे सम्बन्धित ध्वनियों के साथ वाक्यों में प्रयोग की स्थिति पर भी विचार करते हैं। इससे उक्त शब्द के लिखित तथा उच्चरित रूपों का सुस्पष्ट प्रमाण मिल जाता है। वर्तमान समय में भाषा अध्ययन की संरचनात्मक पद्धति पर विशेष बल दिया जा रहा है।



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एम. ए. हिन्दी तृतीय सेमेस्टर द्वितीय प्रश्न पत्र :भाषा विज्ञान एवं हिन्दी भाषा ,पाठ्यक्रम (syllabus)2023-24।


 एम. ए. हिन्दी साहित्य तृतीय सेमेस्टर द्वितीय प्रश्नपत्र :भाषा विज्ञान एवं हिन्दी भाषा, PYQ 2022.






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